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Vikas Rohilla

Abstract

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Vikas Rohilla

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किसान

किसान

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देखता हूँ मै नित दिन एक इंसान को 

धूप मे जलता हुआ उस किसान को 

पेट सबका भरता है मिट्टी से फसल उगाता है 

उस किसान के लिये तो धरती ही उसकी माता है 


ना कभी किया विश्राम हर दिन रात करते रहे काम

बरसात के मौसम मे ना भिगने का डर ना दिया सेहत पर ध्यान 

गर्मी की तेज धूप मे पैर उसका भी जलता है 

कंधे पर रख कर फावडा फिर भी वो चलता है 


आराम जरा भी ना उसके तन मे रहता है

कोई डर ना कभी उसके मन मे रहता है 

चाहे जितना भी संकंट उस पर पडता है 

बिना बोले फिर भी वो चुपचाप सहता है 


पूरा दाम मिले फसल का बस इतना ही वो चाहता है 

उस किसान के लिये तो धरती ही उसकी माता है 

आखिर हम कैसे भूल गये मेहनत किसान की 

दिन हो या रात हो उसने परिश्रम तमाम की 


सर्दी मे ठण्ड से गर्मी में धूप से लड़ते हैं 

तब जा के देश मे अन्न के घड़े भरते हैं 

अपने परिश्रम से बच्चों को भी पढाता है 

मेहनत का पाठ उनको हमेशा सिखाता है 


सर्दी की ठण्ड मे शरीर उसका भी"विकास" ठिठुरता है  

मेहनत से उसकी देश में तब भुखमरी का संकट टलता है।  


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