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Vikas Rohilla

Abstract

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Vikas Rohilla

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मोहब्बत और शहादत

मोहब्बत और शहादत

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वो जब किसी से हो जाये कहीं का न छोड़े तुम्हें, 

इश्क़, मोहब्बत और शहादत सब उसके नाम ही तो है।


बदनाम होंगे इश्क़ में तो क्या नाम ना होगा, 

शहादत वालो के भी, दिलो पे, नाम ही तो है।


जब इश्क़ किया है तो ज़माने से डरना कैसा, 

आगा़ज कर दिया है, आगे अंजाम ही तो है।


अंजाम जो भी हो परवाह कैसी इश्क़ और शहादत में, 

पैरो मे जमीं, सर पे आसमान ही तो है।


मुल्ज़िम गुनाह साबित होने तक मुजरिम नहीं होता, 

आशिकों पे भी गुनाह के ये बस, इलज़ाम ही तो है।


आसान तो नही किसी से नफ़रत और दुश्मनी रखना, 

इश्क़ और शहादत एक दूजे पे मेहरबान ही तो है।


जो प्यार करते हैं वो मरने से भी नहीं घबराते "विकास", 

जब दिल ही हार दिया, बाकी बची बस, जान ही तो है।


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