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Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract

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Vijay Kumar parashar "साखी"

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भेड़चाल

भेड़चाल

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भेड़चाल से लोगो की बड़ी दिल्लगी है

शेरों की ख़त्म हो गई है अब जिंदगी है

हर तरफ़ सौर-शराबा है,

सबके दिल मे कांटा है,


सब कर रहे हैं चापलूसों की बन्दगी है

चंदन का अनुसरण लोग कम करते हैं

बबूल के लोग हो रहे शौक से सम्बन्धी है

भेड़चाल से लोगों की बड़ी दिल्लगी है


खुश्बू से आजकल लोग बडे परेशान है

लोगो की प्यारी चीज हो गई अब गंदगी है

तड़क-भड़क में आजकल जी रहे है लोग,

सादगी उनकी हो गई है अब नापसंदगी है


कहीं ये भेड़चाल खून के आंसू न रुला दे,

दिख रहे चंद उजालों के काजल न लगा दे,

तू बच जा साखी, ज़माने की भेड़चाल से,

खुद की चाल से ही होगी तेरी निशानगी है।


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