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मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

Action Classics

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मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

Action Classics

ख्वाहिशें

ख्वाहिशें

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ख्वाहिशें 

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अपने ही लगने लगे अजनबी से मुझे 

ना मुहब्बत रही, ना आशा रही उनसे मुझे ।


खुद ही खुद से बातें करने लगा मैं पागल 

किसी से कोई वास्ता न रहा जब से मुझे ।


मेरे आंसुओं की कीमत न समझी किसी ने 

मेरे अपनों ने ही मारा धीमे जहर से मुझे ।


मुश्किलें हौसलों की बड़ी वजह बन गई

अब रास्ता पूछने की जरूरत नहीं किसी से मुझे ।


खत्म जीने की जब हो गईं ख्वाहिशें 

एक वजह मिल गई जीने की कविता से मुझे ।


जमाने का क्या, जमाना तो हवा के पीछे चलता है

मनमौजी हूं, गम क्या खाक दूर करेगा मुस्कान से मुझे ।


अपने आंसुओं का कतरा-कतरा बहाकर बैठा हूं 

अब कोई उम्मीद नहीं निष्ठुर जमाने से मुझे ।


- मुकेश कुमार ऋषि वर्मा


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