ख्वाहिशें
ख्वाहिशें
ख्वाहिशें
---------
अपने ही लगने लगे अजनबी से मुझे
ना मुहब्बत रही, ना आशा रही उनसे मुझे ।
खुद ही खुद से बातें करने लगा मैं पागल
किसी से कोई वास्ता न रहा जब से मुझे ।
मेरे आंसुओं की कीमत न समझी किसी ने
मेरे अपनों ने ही मारा धीमे जहर से मुझे ।
मुश्किलें हौसलों की बड़ी वजह बन गई
अब रास्ता पूछने की जरूरत नहीं किसी से मुझे ।
खत्म जीने की जब हो गईं ख्वाहिशें
एक वजह मिल गई जीने की कविता से मुझे ।
जमाने का क्या, जमाना तो हवा के पीछे चलता है
मनमौजी हूं, गम क्या खाक दूर करेगा मुस्कान से मुझे ।
अपने आंसुओं का कतरा-कतरा बहाकर बैठा हूं
अब कोई उम्मीद नहीं निष्ठुर जमाने से मुझे ।
- मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
