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Parinita Sareen

Abstract

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Parinita Sareen

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ख्वाहिश

ख्वाहिश

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घर की गलियां, वो चौबारा छोड़;

बस निकल आएं हैं कहीं दूर, चलते - चलते।

मंज़र की खबर भी है और रास्तों की परवाह भी,

पर इस पल में ही थम जाए ये शाम, यूं ही ढलते - ढलते।


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