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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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बुलंदिया

बुलंदिया

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हमने खुद को ज़िंदा जलते देखा है

रोशन दिन आँखों में ढलते देखा है 


सांस-सांस पीर कसमसाती रहती 

मुर्दा सपने पांवपांव चलते देखा है 


उगते सूरज के जलवे देखे हर दिन

उदास शाम को भी उतरते देखा है 


ख्वाहिशें, सारे ही रंग उतार देती है

उम्रदराज को भी, मचलते देखा है 


दरवाजे पर नहीं कोई दस्तक हुई

हर सुब्ह उन्हें वैसे गुजरते देखा है 


दिन बुरे हों,ये दरिया भी सूख जाए

उन बुलंदियों को फिसलते देखा है।



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