We welcome you to write a short hostel story and win prizes of up to Rs 41,000. Click here!
We welcome you to write a short hostel story and win prizes of up to Rs 41,000. Click here!

अक्षरश : हिंदी साहित्य Dg

Abstract


4  

अक्षरश : हिंदी साहित्य Dg

Abstract


खुशियाँ

खुशियाँ

1 min 190 1 min 190

महक रहा घर आँगन पर्वों की बहार से

बिखर रहीं खुशबू रंगों की फुहार से

द्वेष-भाव भूलकर मिलन का त्यौहार आया

चहक रहा हर कानन हम सबके प्यार से


थोड़ी सी ये खुशियाँ जीने का अंदाज़ सिखा देती हैं

जीवन को नई उमंगों और तरंगों से भर देती हैं

दिल में प्यार भरता है फूलों के लहलहाने से

हर घर चहक उठता है कँगन की खनक से


बैर-भाव भूलकर सब एक हो जायें ऐसे

सब रंग मिल जाते हैं जैसे पर्वों के मिलन से

होली, ईद और दिवाली से दिल्लगी करके देखो

झोली भर जायेगी हम सबकी खुशियों से।


Rate this content
Log in

More hindi poem from अक्षरश : हिंदी साहित्य Dg

Similar hindi poem from Abstract