STORYMIRROR

Rajeshwar Mandal

Tragedy

4  

Rajeshwar Mandal

Tragedy

खिड़की

खिड़की

1 min
235


वो जब भी इधर से गुज़रता होगा

खिड़की की तरफ देखता होगा

देख बंद खिड़की

एक हूक सी सीने में उठता होगा 

पुर्जी रखी तो नहीं किसी कोने में 

डरते डरते खोजता होगा

इधर उधर मंडराता होगा 

आहिस्ता फिर झांकता होगा

मैं नहीं होऊंगी वहां 

फिर भी एक आवाज 

उसके कानों तक जाता होगा 

ब्याही गई या कहीं छुपाई गई

चुपके से किसी से पुछता होगा 

अब न कोई किस्से न कहानी 

पता नहीं वो अब कहां होगा

अपनों संग हंसता होगा 

या याद कर मुझे 

चुपके चुपके रोता होगा

वो जब भी इधर से गुज़रता होगा 

खिड़की की तरफ देखता होगा।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Tragedy