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Dr Baman Chandra Dixit

Abstract Classics

4  

Dr Baman Chandra Dixit

Abstract Classics

ख़ुद को लिखता हूँ

ख़ुद को लिखता हूँ

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 चेहरा देखने के बहाने ख़ुद को देखता हूँ
 हाँ , मैं बार बार आईना देखता हूँ ।।

 अंदर झांकने का कुब्बत आंखों में होती कहाँ आंखों के बजाय मैं दिल से देखता हूँ ।।

 अंधा हूँ मैं , उन आंखवालों के नज़र से
 जिनके भीतर का भूत भगाने लिखता हूँ ।।

 बेवजह मुस्कुराते जो कुछ तो मतलब होगा
वजह और मतलब में मैं फर्क को देखता हूँ ।।

 लेकिन....
 खुद ही को सुधार न पाया औरों को क्योँ कहूँ
 ख़ुद को मिटाता रोज़ ख़ुद को लिखता हूँ ,
 हाँ ... मैं बारबार आईना देखता हूँ ।।


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