ख़ुद को देखते हैं
ख़ुद को देखते हैं
चलो आज खुद से मुलाकात करते हैं
ख़ुद ही कि आईने से खुद को देखते हैं ।।
आदी हो चुकी आंखें औरों को देखने में
वही नज़र से चलो खुद को देखते हैं ।।
नजारों से नज़रों को फ़ुर्सत मिलती नहीं
हजारों में हाजिर कर खुद को देखते हैं ।।
शक्की निगाहों का शौक रखते तो हैं मगर
उसी नज़र से कभी ना खुद को देखते हैं ।।
साम अपनी और ज़ाम अपना है फिर भी
जायके से जुदा कर खुद को देखते हैं ,
ख़ुद ही कि आईने से खुद को देखते हैं ।।
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