ख़त लिखा भेज न सका
ख़त लिखा भेज न सका
आज फ़िर एक बार मेरी छुट्टी रद्द हो गई
सोचते सोचते ही रात से सुबह हो गई
कल मुझे तैनात होना है,सीमा पर
ये रात अंतिम हो सकती है, मेरी पर
इस रात के ख्वाबों में,पूरी जिंदगी खो गई
पहले नमन किया ख्वाबों में,गांव की माटी को
फिर याद किया मां तेरी पतित तपावन गोदी को
सारी दुनिया की दौलत से,तू प्यारी लगती है,माँ
तेरी ममता को याद कर रोते रोते ही भोर हो गई
आज फ़िर एक बार मेरी छुट्टी रद्द हो गई
याद कर मेरे प्यारे दोस्तो तुमको
फूट फूट कर तो बहुत रोया था उस रात को
पर तुम्हारी बातें याद कर,यारों
फ़िर से शेरों सी मुस्कान लबों पर हो गई
वापिस घर से जब आने लगा
याद कर तुझे साखी,
आँखो के आगे अंधेरा छाने लगा,
तुझे देख सामने धड़कने रुआ रुआ सी हो गई
आज फ़िर एक बार मेरी छुट्टी रद्द हो गई
आख़िर में जिस्म में भी जान न रही
याद कर तुझे बेटी,
मेरी आँखो से अश्रुधारा भी न बही
ख्वाबों से ले ली रुखसत और सुबह हो गई
बदकिस्मती से ख्वाबों का ख़त तकिये के नीचे रह गया
सीमा पर इस बार मेरा भी तिरंगे को आखरी सलाम हो गया
तिरंगे में लिपटे शव के साथ
जब खत मिला गांववालों को
कहा था उस समय सबने एक स्वर में
तिरंगे के साथ ही रहने दो इसको
अर्थी पर तिरंगे के साथ वो मेरी आखरी सुहाग सेज हो गई
आज फ़िर एक बार मेरी छुट्टी रद्द हो गई।
