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Nand Kumar

Abstract

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Nand Kumar

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खामोशी

खामोशी

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हर तरफ खामोशी ही खामोशी लबों पर छाई है ।

कारण भय का साम्राज्य अपनो की भलाई ही है।।


आज बोलते लब उन्ही के जो धनी अरु वली हैं ।

हजारो पाप कम उनको दल की गंगा में जो घिरे हैं।।


हम क्या कहते क्या बोलते क्या सर्च करते हैं ।

सब पता पर पापियो के पाप पर पर्दे पड़े हैं।।


अपने हित की कहे तो उनकी नाकामियां खुल जाएंगी ।

छल दम्भ से भटका हमे बस यूं ही छलती जाएंगी ।।


किन्तु हद खामोश रहने सहन करने की भी है ।

हद जो टूटी तो कहर खामोशी ये बन जाती है ।।


टूटने पर इसके तख्तो ताज कुल बर्बाद है होते सदा से।

जो गुमानी सो गये वो ढाक कर मुख को कफन से।।


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