STORYMIRROR

Abha Chauhan

Abstract Tragedy

4  

Abha Chauhan

Abstract Tragedy

खामोश दीवारें

खामोश दीवारें

1 min
234

खड़ी खड़ी क्या सोच रही है

नसीब को अपने कोस रही है

बाहें फैलाई है सबको पुकारे

खाली मकान की खामोश दीवारें


कभी रंगों से सजा करती थी

तूफान से डरा करती थी

चमकते थे उस पर चांद सितारे

तन्हा सी हो गई वो खामोश दीवारें


मनाते थे सब मिलकर खुशियां

बहुत सुंदर थी छोटी सी दुनिया

क्या खूब थे उस घर के नजारे

तब बोल उठती थी खामोश दीवारें


स्वार्थ ने कर दिया सबको अंधा

रिश्तों को बना के रख दिया धंधा

मासूम बोल ना सके बीचारे

खामोश हो गई वो खामोश दीवारें



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract