कह दो मुझसे प्यार है ::
कह दो मुझसे प्यार है ::
बागों में बाहर है, फिज़ा में खुमार है
तन मचला सा क्यूं जिया बेकरार है
कोयल की बोली प्रीत का त्योहार है
क्या ... तुमको मुझसे प्यार है?
ये हर बात पर तेरा मुस्कुराना
ज़ालिम यूं गज़ब ढा रहा है
तीर सीने पर चलाकर कर
क्यूं मासूम बना जा रहा,
संतरी सूरज की रोशनी उभरी है झील में
या तुने ढलती शाम में फिर आइना देखा है
लहराती हवा से पड़ी हैं जो सलवटें पानी में
मैंने बस एक नज़र में आज ये जहांन देखा है,
चांद की चांदनी में डूबी घनी काली रात
क्या शायराना है आज मिजाज ए हयात
क्यूं ना आगे बढ़े आज तेरी मेरी कुछ बात
ये किस्सा खत्म हो मिले प्यार की सौगात,
सागर की गहराई से आसमान की ऊंचाई तक
हर तह तक हर छोर तक बस तू ही तू है
तेरा जोश जुनून तेरा बढ़ता तेरा भरोसा खुद पे
खुदा का मालूम नहीं,जो हो गर कहीं निशान
मेरा रब मेरा खुदा मुकम्मल बस तू ही तू है,
नभ में पंछी जल में मीन सबके अपने डेरे हैं
बस जा मन में तू भी मेरे यहां सुकूं के घेरे हैं
झूमेंगे मौज में बहेंगें तरंग में हर सुहानी डगर
धानी चुनर ओढ़े हर रस्म और प्रीत के फेरे हैं,
जवाब मुश्किल नही बड़ा सीधा है
सोच के सागर में ना डूबो ए हंसी
उंगली से जुल्फ को यूं उलझाना
होंठ दबा के मुस्काना...
ये शोख़ अंदाज़ ही मेरा जवाब है
अब कह दो... मुझसे प्यार है..
हां मुझसे प्यार है हां मुझसे प्यार है।

