जो भी हो
जो भी हो
जो भी हो
दर्द छलक उठा है
मुमकिन है
खुशी जन्में
और दर्द की
छलकती हुयी जमीन पर
पाँव पांव चले।
पर दर्द का प्रभाव
देर तक रहता है
जब खुशी पांव पांव
चल रही होती है तब भी।
इंसान भी खूब होता है कोई कोई
न दर्द महसूस करता है
न खुशी
बस चलता रहता है
आत्मविभोर हो
आनन्द की पगडंडी पर।
