STORYMIRROR

Rekha Shukla

Abstract

3  

Rekha Shukla

Abstract

जिस्मि जनाजा

जिस्मि जनाजा

1 min
168

बस गई हैं बस्तियां ये भी दिखावा है

आदमी की भीड़ में आदमी ही अकेला है


महंगाईसे बाजार में थम गई उमंगे हैं

गमों की माला से सजा जिस्मी जनाजा है


निवाले की दिवाली अरे क्युं ये छलावा है

रूह में अगन और सीने में तो हताशा है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract