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Vijay Kumar

Tragedy

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Vijay Kumar

Tragedy

जिंदगी

जिंदगी

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अपनों से मुंह छुपाकर कई बार रोई है जिंदगी

नाजुक कंधों पर जिसने उम्र भर ढ़ोई है जिंदगी

न पहचान न सूरत न ठिकाना है कोई

फुटपाथ के भीड़ में कई बार खोई जिंदगी,

अक्सर खाने को तरसते रहे बच्चें

भूखे ही कई दफा सोई है जिंदगी

जीवन में मजबूरियां आने के बाद

लावारिश की तरहा फेंक दी गई है जिंदगी,

सवालों और उम्मीदों में कई वक़्त उलझी है जिंदगी

मिलते तिरस्कारो से भी कई मर्तबा टूटी है जिंदगी

न तन पे है ठीक से कपड़ा न जीने की चाह है कोई

ग़म के समंदर में भी अक्सर डूबी है जिंदगी,

जिस्म के लिए ललचाती नजरो ने भी छलनी की है जिंदगी

हमदर्दी और अपनत्व के नाम पर कई बार लूटी है जिंदगी

दिल और आँखों में दबे है कई खौफनाक मंज़र

हर रोज मरकर फिर से खड़ी हुई है जिंदगी,

जिसने आंसुओ की तरहा जिया हो उससे पूछिये

कैसे सिसक - सिसक के जोड़ी है जिंदगी

अपनों से मुंह छुपाकर कई बार रोई है जिंदगी

नाजुक कंधों पर जिसने उम्र भर ढ़ोई है जिंदगी!


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