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Satyendra Gupta

Abstract

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Satyendra Gupta

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जीवन की भी अजब कहानी है,

जीवन की भी अजब कहानी है,

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जीवन की भी अजब कहानी है,

कुछ बातें नई तो कुछ पुरानी है।

जीवन कभी सुख तो कभी दुःख लाती है,

जीवन कभी नजदीक, कभी दूर ले जाती है।


बचपन की भी अजब कहानी थी,

अपने में मस्त , सुखद जिंदगानी थी।

कभी माता पिता का प्यार था मिलता,

कभी गलती कर डांट भी खानी पड़ती थी।

जिद करके मांगे पूरी करवानी थी,

बचपन की भी अजब कहानी थी।


जवानी में रखा जो कदम,

वो कदम भी कितनी सुहानी थी

सजना ,संवरना, सुंदर दिखना,

लगता आईने से दोस्ती पुरानी थी।

चलना, बोलना , सुनना, देखना,

सब में अलग तरह की कलाकारी है।

कॉलेज में सबसे अलग दिखूं ,

पढ़ाई में भी टॉप रहने की खुमारी थी।

जवानी की भी अजब कहानी थी।


जब लगी नौकरी , इसकी भी अलग कहानी थी,

जिस घर में था रहता सुकून से,

उस घर से अब दूर जाने की अजीब बारी थी।

जिस घर में पलकर हुआ था बड़ा,

उस घर में दो चार दिन की रहने की मजबूरी थी।

घर में आना ,मेहमान जैसा जल्दी जाना,

ये तो जीवन की अनबूझ, अनजान सी पहेली थी।

जो थी दोस्तों की टोलियां, कहां चले गए वो,

अब न मिल पाना किस्मत की अजीब ठिठोली थी।

ये तो जीवन की अजब कहानी थी।


अब जीवन की एक अलग रस्म निभानी थी,

एक से दो हो जाने की अब अजीब सी बारी थी।

शादी करके घर का फर्ज निभाना था,

जिसे पत्नी है कहते उसे अपने घर लाना था।

मात पिता कहना मान शादी का रस्म निभाना था,

इस बढ़ती जनसंख्या में अपना भी मान बढ़ाना था

ये जीवन और जीवन की मोड़ पुरानी थी,

ये तो जीवन की अजब कहानी थी।


अब जीवन में आगे का संघर्ष जारी है,

ना जाने कितने मुश्किलों की बारी है।

एक मुश्किल होता है हल, दूसरा आ टपकता है,

नौकरी और परिवार में ही दिन यूं ही गुजरता है।

पहले अपनी मांगी को था पूरा करवाता,

अब खुद मांगो को पूरा करना पड़ जाता है।

अब गम को छुपाकर हंसना भी पड़ जाता है।

ये कलाकारी भी इसी जीवन में लानी थी,

ये तो जीवन की अजब कहानी थी।


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