जीवन का सफ़र
जीवन का सफ़र
जाने किस मोड़ पर लेकर आ गई है जिंदगी,
कल कुछ और था आज कुछ और ही है,
कई बार जीवन में दुःख लगता है जैसे,
आँख मिचोली ये मुझ से ही खेल रही है,
सामने अतल सतरंगी लहरों का विस्तार,
लगता खोज रही हूँ अपने जीवन का सार,
आँखों में बहते नीर पर आँखें मौन नहीं हैं,
सांसो की आहट जैसे दिल को मेरे भाप रही है,
निकल पड़े एक लम्बे सफ़र पर न जाने कहाँ,
अनाम सी यात्रा जो सिर्फ एक बिंदु से प्रारंभ हुई,
एक अपहचानी सी झलक मुझे दिख रही थी,
सागर की उफनती लहरें उन्हें मिटा रही थी,
वापस आना अब मुश्किल सा मुझे लगता है,
वो लम्हें जिंदगी के आज भी साथ चलते हैं
पर लगता जैसे आज भी वहीं अकेले हम खड़े हैं,
जहाँ से शुरू की थी यात्रा वहां से क्यों आगे नहीं बढ़े हैं,
जब कभी भी मन व्याकुल हो उठा तुम्हारी याद आई,
इस उफनती लहरों में मन की व्यथा जाने क्यों बढ़ गई,
अकेली खड़ी इन लहरों को बस एकटक देखा करती हूँ,
जीवन का हर क्षण मुझको सूना सूना सा लगता है I

