STORYMIRROR

Shashi Aswal

Abstract Inspirational

4  

Shashi Aswal

Abstract Inspirational

जीती जागती मूर्ति

जीती जागती मूर्ति

1 min
265

जबसे सृष्टि की रचना हुई 

हमें समझा गया एक वस्तु 

विभिन्न रूपों में हमें ढाल कर 

बना दिया गया उपभोग की वस्तु 


पिता के घर पुत्री बनकर 

खींची मिली तमाम अड़चने 

घर से बाहर निकलने में 

भेजा गया भाई के पीछे


बिदा हो कर आई पति के घर 

लगाई गई लक्ष्मण की रेखाएँ 

चूल्हा-चौके के काम में आगे 

अहम फैसले में कर दिया गया पीछे 


शुभ कार्य में रखा गया 

हमेशा पति के साथ 

घर से बाहर निकलते ही 

बोला गया चलने को पति के पीछे 


पति का साथ मिला तो 

रखा गया लक्ष्मी का नाम 

बिना पति के रहना पड़ा तो 

कुलटा, डायन, बदचलन मिला नाम 


नवरात्रे में तो पूजा गया 

देवी के रूप में 

कोख में मार दिया गया 

सिर पर बोझ समझ के 


मूर्ति की तरह रखा गया 

घर में सजा के 

कठपुतली की तरह नचाया 

सबने इशारों पर अपने 


सब भूल गए अंतर 

मूर्ति और इंसान के बीच 

नारी को बना दिया गया 

जीती-जागती मूर्ति 


मगर हे पुरुष! सुनो 

नारी मूर्ति नहीं इंसान है 

उसमें भी प्राण-जान है 

अगर वो झुक सकती है 

तो काली बन उठ भी सकती है


वो नहीं माँगती तुमसे 

अपार धन और दौलत 

बस चाहिए उसे तुम्हारा 

साथ, प्यार और सम्मान 


उसे चाहिए अपनी 

हिस्से की आजादी 

उसे चाहिए अपना 

जिंदगी जीने का हक। 


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract