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Kunwar Singh

Abstract

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Kunwar Singh

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जी-ना

जी-ना

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ऐ जिन्दगी 

कब तलक यूँ ही छोड़

लौट जाती हो

यूँ बार-बार भरोसा 

इंसान पर नहीं होगा

एक जिंदगी दो जिंदगी

तीन जिंदगी चार जिंदगी

यूँ छूट जाती है

मैं पेड़ नहीं हूँ 

कि सावन मेरा होगा

टूटे हुए पत्ते

मिट्टी में मिल जाते हैं।



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