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मिली साहा

Abstract Tragedy Inspirational

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मिली साहा

Abstract Tragedy Inspirational

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई

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किसी पहचान की मोहताज नहीं नारी, स्वयं शक्ति स्वरूपा है।

हर युग में इसको साबित किया है नारी ने, इतिहास गवाह है।।


ऐसी ही साहस और वीरता की एक मिसाल है रानी लक्ष्मीबाई।

जिसके अप्रतिम शौर्य की गाथा धरती के कण कण में है छाई।।


देश और अपने राज्य झाँसी की स्वतंत्रता के लिए लड़ी लड़ाई।

अंत में वीरगति को प्राप्त हो गई, वीर साहसी रानी लक्ष्मीबाई।।


पिता मोरोपंत तांबे माता भागीरथी बाई की पुत्री मणिकर्णिका।

प्यार से जिसे मनु बुलाते बचपन का यही नाम लक्ष्मीबाई का।।


मल्लविद्या, घुड़सवारी, शस्त्र विद्याओं में बचपन से ही निपुण।

बाजीराव दरबार में दंग रह जाते सभी देख चंचल मनु के गुण।।


प्यार से छबीली बुलाते मनु को बाजीराव समझते पुत्री समान।

प्रिय खेल खिलौने थे उसके घुड़सवारी करना, चलाना कृपाण।।


निडरता की मिसाल लक्ष्मीबाई में, योद्धाओं के गुण समाहित।

बचपन से ही वीरतापूर्ण कार्य करने को सदा‌ रहती उत्साहित।।


चौदह वर्ष की उम्र में विवाह हुआ शुरू हुई जीवन की कहानी।।

मनु से बदलकर नाम हुआ लक्ष्मीबाई कहलाई झांँसी की रानी।।


किस्मत को खुशियाँ रास न आई एक के बाद एक विपदा आई।

पहले चार मास का पुत्र फिर पति से सदैव के लिए हुई जुदाई।।


सलाह मान दरबारियों की, पुत्र गोद ले नाम रखा दामोदर राव।

लेकर उसको संभालने लगी राजकाज अभी भरे कहाँ थे घाव।।


राजा की मृत्यु उपरांत झाँसी पे पड़ चुकी थी नज़र अंग्रेजों की।

एक के बाद एक प्रयास कर रहे थे अँग्रेज़ झाँसी को हड़पने की।।


व्यर्थ होते जा रहे थे अंग्रेजों के रखे‌ सभी प्रस्ताव और प्रलोभन।

सबसे निपटती लक्ष्मीबाई झाँसी को बचाने में लगा दिया जीवन।।


अभी सामने से लड़ कभी परदे के पीछे प्रजा की करती भलाई।

प्रजा के लिए किसी भी हद तक चली जाती थी रानी लक्ष्मीबाई।।


खुले विचारों वाली रानी, महिलाओं को भी देने‌ लगी प्रशिक्षण।

अस्त्र शास्त्र शिक्षा घुड़सवारी सिखा महिला सेना बनाई सक्षम।।


रानी को कमजोर समझ कर अंग्रेजों ने बनाई एक नई योजना।

दत्तक पुत्र नहीं हो सकता उत्तराधिकारी करने लगे यह घोषणा।।


मुकदमा चलाया रानी पर किला तक छोड़ने को किया मजबूर।

पर कहाँ हार मानने वाली थी रानी भी हौसला था उसमें भरपूर।।


गोद निषेध सिद्धांत अपनाकर अंग्रेजों ने झांसी को हड़प लिया।

सहन न हुआ रानी से अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध उसने छेड़ दिया।।


सन् सत्तावन झाँसी का युद्ध जो केन्द्र बना स्वतंत्रता संग्राम का।

झाँसी ही नहीं युद्ध बना संपूर्ण भारतवर्ष को आज़ाद कराने का।।


केवल पुरुष ही नहीं, महिलाएँ भी मैदान में उतर गई करने युद्ध।

दहल उठी थी तलवार तब रानी लक्ष्मीबाई की अंग्रेजों के विरुद्ध।।


अदम्य साहस का परिचय दिया रानी ने, दुश्मनों को धूल चटाई।

आखरी दम तक छकाती रही दुश्मनों को पर हाथ कभी न आई।।


घायल होकर भी शेरनी सी दहाड़, तलवार भी हाथ से ना छूटी।

अपने देश अपने राज्य की खातिर अंतिम साँस तक लड़ती रही।।


वीरता अदम्य साहस और शौर्य का यह नाम है रानी लक्ष्मीबाई।

जिसकी वीरगथा युगों-युगों तक यहाँ के कण-कण में देगी सुनाई।।



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