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Meena Mallavarapu

Tragedy

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Meena Mallavarapu

Tragedy

जान नहीं पाई

जान नहीं पाई

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जान नहीं पाई,इस दुनिया में क्यों आई

आख़िर संग मैं अपने क्या लाई

बाकी कहां,क्यों किस हाल में छोड़ आई

एक ओर कुंआ दूजी और खाई

बस यह पल,यह कदम दे मुझे दिखाई

उम्र सारी बस सवालों में बिताई

वैसे अंधेरी कोख से निकल कर मैं आई

फिर क्यों इतना डरती अंधेरों से माई

क्यों करती है बेकल बेचैन मुझे तन्हाई

क्यों ज़िंदगी उलझनों में गंवाई

हो जाती मायूस,कैसे करूंगी भरपाई

चुकाना चाहूं मैं तेरी पाई पाई 

हिसाब किताब तेरा कुछ समझ न पाई

बही खाते में कितनी रातें गंवाई

कुछ भी सही नहीं लगा ,रूह मुरझाई

हर ख़ुशी ख़ूबसूरत, हमेशा भाई

मगर ग़म की परछांई भी कभी रास न आई

एक बिना दूजा अधूरा,समझ न पाई 

शिकायत न कर अरे नादान-बोली ख़ुदाई

गिला शिकवा सुबहो शाम - है मेरी रुसवाई

इस ब्रह्मांड का आधार है मिलन-जुदाई ,

ग़म और ख़ुशियां , काट छांट और तुरपाई

कभी चापलूसों की कतार,कभी जगहंसाई

उठ इन सब के ऊपर ,मान लूंगी उसे भरपाई।



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