STORYMIRROR

Dr J P Baghel

Abstract

3  

Dr J P Baghel

Abstract

जाग रे ! मनुंआ

जाग रे ! मनुंआ

1 min
200

अब बीत रही है रात, जाग रे ! मनुआ

मीठी-मीठी ये नींद, त्याग रे ! मनुआ।


सुन गीत भोर के लगे पखेरू गाने

पूरब से नभ में लगी लालिमा छाने।


उठ देख दूर अंधियारा भाग रहा है 

जग जा मनुआ तू भी, जग जाग रहा है।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract