इंतज़ार
इंतज़ार
इंतज़ार की खिड़की थक गई तरसते सुहाने लम्हों की बारिश, स्वार्थ के इंधन से लबालब भरी है ज़िंदगी की सुराही.!
अब तो धूप, हवा, बारिश ज़हरिली परतों से लिपटी बह रही है, ताले पड़े है एहसासों की संदूक पर दिखावे के पंछी शोर करते चहचहाते है.!
उम्मीदों की लाशों पर चलकर
कब तक जिए कोई, गुलाबी रातें और केसरिया शाम सिमट गई है,
चाँदनी भी तपती धूप में बदल गई,
प्रेम की फुहारें स्पंदन को तरस गई,
जहाँ देखो दर्द की दरारें अपनी जगह करती रही.!
लड़खड़ाते है कदम नासाज़गी के पंक पर चलते, सुनहरे शब्दों को तरसती कलम रूठी है काली स्याही से.!
जाते-जाते एसा क्या लिख जाऊँ जिसमें ताजगी, खुशियाँ और रंगीनियों की रौनक दिखे, कायनात पर हरसू अमन ओर सुखांत के जेवर सजे।
