इक पगला दीवाना
इक पगला दीवाना
वो कल भी लाचार था
आज भी बेबस है अपनी दुनियां में
वो कल भी परेशान था
आज भी हैरान है अपनी उलझनों में
वो कल भी अकेला था
आज भी एकाकी है लोगों की भीड़ में
कोई और नहीं बस
इक आशिक दीवाना है वो
जी आज भी खुद से ज्यादा चाहता है उसे
कदम कदम बिछाए थे जिसने
बेवफ़ाई के कांटों भरे जाल
बात बात पर खफा हो जाना
जैसे उसकी फितरत हो
पल पल में रूठ कर चले जाना
जैसे उसका कोई ख्वाब हो
नाराज़गी के पहाड़ पर खड़े होकर
उसका मंद मंद मुस्कुराना
और ये दीवाना मनाता रहा उसे
हर कोशिश हुई थी नाकाम
शायद बेवफा को मिल गया था
इस दीवाने से कोई और बेहतर दीवाना
मगर कौन समझाए इस पगले दीवाने को
उस बेवफ़ा से बेहतर और भी हैं जहां में
बस इक बार कोशिश तो कर।
