हरा भरा उपवन अपना
हरा भरा उपवन अपना
कली कली और फूल फूल
यौवन में हैं सब शूल शूल
हरित चादर ने लपेट लिए
उड़ता नही अब धूल धूल
सुंदर सुरभित शोभित
सघन कितना
हरा भरा उपवन अपना।
अँखियाँ हो जाती हरी हरी
गोद धरती की भरी भरी
अब देख दुपहरी डरी डरी
ताजे पत्तों की शीतल छांव से
तृष्णा धरा की तरी तरी
हरा हरा मन अपना।
हरा भरा उपवन अपना।
फूल फूल और कली कली
रसपान करता अलि अलि
नन्हें बच्चे पीछे पीछे भागें
वो दौड़ लगाती गली गली
तितलियों से भरा गगन अपना।
हरा भरा उपवन अपना।
हो बसन्त का प्यारा मौसम
या सावन का न्यारा मौसम
दुनिया दिखती हरी हरी
अँखियों का दुलारा मौसम
भरा भरा जीवन अपना।
हरा भरा उपवन अपना।
जल की बूंदे जब फसल फसल
करती हैं जब चहल पहल
देख कृषक पुलकित मन
दिल से जाए उछल उछल
कूके कन कन अपना
हरा भरा उपवन अपना।
डाल डाल पर झूल झूल
गा के गीतों को कूल कूल
प्रेम रसों में डूब डूब
गम को जातीं भूल भूल
मनभावन सावन अपना।
हरा भरा उपवन अपना।
नदियों की बहती धार धार
करतीं सागर को पार पार
जीवन मे आगे बढ़ते जाना
यही जीवन का सार सार
हर्षित सारा वन अपना।
हरा भरा उपवन अपना।
न कृत्रिमता का झंडा गाड़ गाड़
न छाती धरती का फाड़ फाड़
तरु से ही पोषित वसुधा काया
इन्हें काटके मत कर तू हांड़ हांड़
मिट जाएगा आँगन अपना
हरा भरा उपवन अपना।
फूल फूल से बाग सजा
नित नए एक पेड़ लगा
बन रक्षक हरियाली का
ओर चहुँ चारु चमन बना।
हो पक्का प्रण अपना।
हरा भरा उपवन अपना।
