STORYMIRROR

Chhabiram YADAV

Abstract

3  

Chhabiram YADAV

Abstract

हँसना मना नहीं है

हँसना मना नहीं है

1 min
243

सर्दी की गुनगुनी धूप

तन को सेकती

बहुत सकूँ देती

बाहर बैठ, हाथ में

अख़बार को पढ़ते

खो जाते अतीत के

पल में


जब खुद एक परिंदे 

की तरह थे 

आज़ादी थी, ख़ुशी थी

बंधन कोसों दूर था

मेरी परछाईं से 

मन ही मन में 

एकाएक कुछ भूले पल

आज याद आये 


मैं मुस्कुरा के ही 

अखबार से चेहरा को

छुपाया, मन को समझाया

अब तो बंधन में हूँ

कुछ जंजीरें जकड़ी है

मेरे तन और मन को

जो लगा कर रखी है

पहरा हर क्षण

ये भी जीवन का एक रूप है

और नहीं तो क्या

हँसना मना नहीं है

पर मजबूर हूँ...



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract