हकीकत का आईना ....
हकीकत का आईना ....
सचमुच आज खुद को बहुत छोटा माना,
जब असल ज़िंदगी को खुशी से जीते हुए उन लोगों को देखा,
जिनको संतोष था.... जो था उसमें संतुष्टि थी,
हाथ न होते हुए भी आंखों में सपने थे,
परिस्थिति विकट होते हुए भी संघर्ष करने की ताकत थी,
कोई साथ न होते हुए भी खुद पर विश्वास था,
आंख न होते हुए भी हाथों में कुछ करने की चाह थी,
पैर न होते हुए अपनी प्रतिभा से दुनिया को चौकाने की हिम्मत थी,
सचमुच हम छोटी छोटी मुश्किलों में हार मानने वाले,
क्या कभी समझ पाएंगे उनके संघर्ष को,
उनके आंखों में पल रहे उन सपनों को पूरे करने की चाह को,
नही, क्योंकि हम जानते नही असली संघर्ष क्या होता है,
सपनों को पूरे करने की चाह क्या ह़ोती है,
कुछ न होते हुए भी सबको अपने हुनर से चौकाने की हिम्मत क्या होती है,
आज हैरान हूं खुद को देखकर क्या कमी है मुझमें,
हाथ पैर आंखें सब सलामत है आर्थिक स्थिति सही है,
फिर भी हम कहते है हम परेशानियों से घिरे हुए है,
हम बहुत संघर्ष करके आगे बढ़े है,
लेकिन असली संघर्ष और परेशानी तो वो लोग भुगतते है,
जिनके पास कुछ भी न होते हुए,
हंसते हुए मुश्किलों का सामना करने की हिम्मत होती है,
आंखें नही है फिर भी वो सपने देखते है,
हाथ नही है फिर भी अपनी काबिलियत दिखाते है,
पैर नही है फिर भी बुलंदियों की सीढ़ियां चढ़ते है,
आज जब हकीकत का आईना देखा,
तब सचमुच आज खुद को बहुत छोटा माना।
