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आचार्य आशीष पाण्डेय

Romance

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आचार्य आशीष पाण्डेय

Romance

हे अप्रणयि!

हे अप्रणयि!

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ज्योति नयनों की जलाकर धड़कनों का सुम बिछा दूं

सांस की माला बनाकर कण्ठ यह तेरा सजा दूं

चन्द्र मुख तन चन्द्रिके हे! प्रेम यह स्वीकार कर ले,

तेरे अभिनन्दन में मैं उस मेघ की दुन्दुभि बजा दूं।।


दामिनी रशना बनाकर मैं तुम्हें उपहार दे दूं

भोर की किरणों को तेरे अधर को श्रृंगार दे दूं

मेरा हिय तुमको समर्पित, कर समर्पित तू हृदय को,

मधुर ध्वनि स्मृति मधुर कर क्षिति तनू संसार दे दूं।।


प्रेम का दीपक जलाकर यह अंधेरा दूर कर दे

प्रेम को अमरत्व देकर कौमुदी मद चूर कर दे

क्या तेरी उपमा करूं?उपमा सभी असहाय दिखती,

हे ब्रह्म की अनमोल प्रतिभे! आज इच्छा पूर कर दे।।


हर हृदय की सुन हे मलिके! स्वयं हिय मालिक बना ले

मैं अकिंचन इस जगत में दीर्घ हूं खुद में मिला ले

पूर्ण होकर पूर्ण न मैं पूर्ण कर खुद का बनाकर,

प्रेम की आशा मिटे न प्रेम अपने हिय खिला ले।।



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