हाथों की लकीरें
हाथों की लकीरें
हाथों की लकीरें नहीं बनाती विद्वान,
हिम्मत और यत्न से, बनता है महान।
मेहनतकश इंसान की,बनती पहचान,
लकीरों के चक्कर में,क्यों बना अज्ञान।।
धनदौलत और ये घर, महल अटारी,
घर में दुल्हन सजकर बैठी हो प्यारी।
रोता रहे भूखा बन जगत में भिखारी,
ये हाथों की लकीरें,लगती हैं बेकारी।।
ऐसे भी इंसान हैं,बदल लेते हैं भाग्य,
क्षण में बदल दे, हाथों की ये लकीरें।
अगर सोच हो सकारात्मक जन कभी,
नाम कमा सकता है बैठ गंगा के तीरे।।
लकीरों से नहीं मेहनत से बने इंसान,
फकीर भी मेहनत से बढ़ाता है शान।
लकीरों के चक्कर में जन कोई भी पड़े,
धन दौलत खो देता, खो देता सम्मान।
आओ बदल दे, बदल दे अपना भाग्य,
हिम्मत और मेहनत के हो अटल इरादे।
आ जाएंगी हाथों पर, स्वत: ही लकीरें,
बन जाएगा इतिहास,बन रह जाये यादें।।
