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मिली साहा

Abstract Tragedy

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मिली साहा

Abstract Tragedy

गरीबी

गरीबी

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गरीबी एक बड़ी समस्या ही नहीं, अपितु अभिशाप है,

पल-पल झुलसती जाती ज़िन्दगी जिसमें ऐसा ताप है,


विक्षिप्त मन क्षीण तन आँखों में बेबस लाचारी लेकर,

थक जाती ज़िंदगी रुक जाती साँसे गरीबी से लड़कर,


दो वक्त की रोटी मिल जाए इसी का रहता है इंतजार,

समाज की हीन भावना का भी गरीब बनता है शिकार,


पेट की भूख की आग जब प्रचंड रूप धारण करती है,

चोरी मारपीट और न जाने कैसे-कैसे जुर्म करवाती है,


गर्मियों की तपन है जलाती सर्दियों की ठंड मार जाती,

फुटपाथ से शुरू ज़िंदगी फुटपाथ पे ही ख़त्म हो जाती,


निराशा की जंजीरे गरीब को इस कदर जकड़ लेती है,

कि दुःख दर्द, तकलीफ़ ही, इनकी दौलत बन जाती है,


मूल ज़रूरतें पूरी न होती शिक्षा स्वास्थ्य कहाँ से पाए,

पेट में रोती है भूख जब, ख़्वाब आंखों में कैसे सजाए,


अमीर गरीब के बीच समाज में, बन गई है गहरी खाई,

अमीरों का ही डंका बजता, गरीब कहाँ देता है सुनाई,


जान की परवाह किए बिना सड़कों पर दौड़ लगाते हैं,

पेट भरने के लिए जान अपनी, जोख़िम में डाल देते हैं,


नन्हें-नन्हें हाथ भी भीख मांगने को हो जाते हैं मजबूर,

बचपन भी जी कहाँ पाते हैं, ये माता-पिता के नन्हे नूर,


गरीबी मजबूर ही नहीं करती, मासूमियत छीन लेती है,

फटी हुई जेब में इनकी, किस्मत भी नहीं ठहर पाती है,


तन कपड़े सर पे छत ख्वाहिश बनकर ही रह जाती है,

सूख जाते हैं आँसू भी इनके ये गरीबी इतना रुलाती है,


जिंदा रहने को कचरे के ढेर में भी ये रोटी तलाशते हैं,

मिल जाए गर एक टुकड़ा भी, तो किस्मत समझते हैं,


टूट जाती है जिस दिन हिम्मत, थक कर बैठ जाता है,

बेबसी और पेट में भूख लेकर, गरीब दम तोड़ देता है।



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