गरीबी-अमीरी सदा न रहे
गरीबी-अमीरी सदा न रहे
प्रकृति में भी विविधता ,
मिलती ही है हर कहीं।
जगत में दो चीज़ें कभी,
एक सी तो हैं होती नहीं।
गतिशील सारा जगत है,
कुछ एक सा रहता नहीं।
गरीबी-अमीरी सदा न रहे,
अदलती-बदलती रहती यहीं।
बदलती रहती सारी दुनिया ,
बदलते हुए समय के ही संग।
कल के पक्के मित्रों के बीच,
कभी भी हो सकती है जंग।
बचपन से बुढ़ापे तक बदलती,
सोच तक सदा एक रहती नहीं।
गरीबी-अमीरी सदा न रहे,
अदलती-बदलती रहती यहीं।
सुखी हों दुःखी हों निर्धन या धनी,
मानववृत्ति आभूषण है मानव का।
वृक्ष झुक जाते हैं पाकर के फल ,
अहंकार होना स्वभाव है दानव का।
अपरिग्रह -अहिंसा का पालन जो हो,
अखिल विश्व में शांति मिले हर कहीं।
गरीबी-अमीरी सदा न रहे,अदलती-बदलती रहती यहीं।
कोई न कुछ लेकर के आए थे यहां,
और ही कोई न कुछ लेकर जाएंगे।
निज आचरण-व्यवहार के बल पर,
अपयश या यहां हम यश कमाएंगे।
ऐश्वर्य-दौलत और धन क्षणभंगुर है,
नेकनामी-बदनामी की अमरता रही।
गरीबी-अमीरी सदा न रहे,अदलती-बदलती रहती यहीं।
भौतिक पूंजी आपदा में सदा साथ दे न सके,
आचरण -वृत्ति से आपकी बनती है पहचान।
भवन- दौलत -स्वर्ण-माणिक्य साथ देते नहीं,
आपदा आती जब भागते हैं बचाने को जान।
निरापद जीवन है इनके सीमित उपभोग तक,
जनती है दुश्मन जान का खतरा बढ़ाती यही।
गरीबी-अमीरी सदा न रहे,अदलती-बदलती रहती यहीं।
