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अरविन्द त्रिवेदी

Inspirational

4  

अरविन्द त्रिवेदी

Inspirational

ग्रामीण नारी

ग्रामीण नारी

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अबला नहीं गाँव की नारी,

यही गाँव की शान ।

कमतर मत आँको पुरुषों से,

दो इनको सम्मान ।।


गृहणी बनकर नारी देखो,

घर - आँगन नित्य सजाती है ।

वक्त पड़े तो खेतों में भी,

वो अपना स्वेद बहाती है ।

गढ़ती नित परिभाषा श्रम की,

हृदय आत्म - सम्मान । 

कमतर मत आँको,,,,,,,,


जोत रही है हल खेतों में,

अन्न धरा से उपजाती है ।

दारुण विपदाएं सहकर भी,

वह घर - परिवार चलाती है ।

ममता की प्रतिमूर्ति सरीखी,

देती सबको मान ।

कमतर मत आँको----------


ग्रामीण औरतें श्रमी बहुत,

पशुओं को चारा डाल रहीं ।

निर्धनता में मजदूरी कर,

अपने बच्चों को पाल रहीं ।

मिले नहीं आभूषण तन को,

या महँगा परिधान ।

कमतर मत आँको,,,,,,,,, ।


      


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