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अच्युतं केशवं

Drama

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अच्युतं केशवं

Drama

गोरी बैठी बाग में

गोरी बैठी बाग में

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गोरी बैठी बाग में,केश सँवारे हाथ

केश उठैं तो पूर्णिमा, गिरत अंधेरी रात। 


गिरत अँधेरी रात, नैन तारे से चमकैं।

हँसत कुमुदिनी खिलै,धवल दन्तावलि दमकै।


फोन सैल्फी खोल, देखती चोरी-चोरी

मुख फेरै मुस्काय, बाग में बैठी गोरी।


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