ग़ज़ल
ग़ज़ल
हुस्न पानी में बहा के आई हो।
चांदनी में ही नहा के आई हो।।
ये तुम्हारी शोख नज़र खामोश सी है,
शिकवे भी क्या तुम भुला के आई हो।
भीगा सा है क्यूं ये दामन का सिरा।
तुम मिरी जां को रुला के आई हो।
जान लेने का इरादा है मिरी,
खुद को इतना जो सजा के आई हो।
किस गुनाह में शरीक हैं हम भला,
किस से क्या-क्या तुम छुपा के आई हो।

