गजल (बेसहारा)
गजल (बेसहारा)
बुढ़ापे पर हर इंसान बेसहारा लगता है,
मानता नहीं जब कोई, खुद हारा हारा लगता है।
कंधे तक झुक गए, जिनको बुलन्दी देने में सुदर्शन
उन्हीं को बापू अब बेचारा लगता है।
जीवन भर जोड़ कर रखी थी जिनके लिए पाई पाई
उनको बूढ़ा नाकारा लगता है।
लहरों से टकरा कर जिसने जीवन को जीता
वो दरिया भी अब किनारा लगता है।
बनकर बरगद का पेड़ छाया दी थी जिनको,
वो ही पेड़ अब तप तपाया लगता है।
धूप, गर्मी, सर्दी सही जिनके लिए उम्र भर,
अब हर मौसम में, बाप बच्चों को नकारा लगता है।
भूल जाते हैं फर्ज सभी रिश्ते बुढ़ापे में सुदर्शन,
बुजुर्ग सभी को किनारा लगता है।
पाल रखे हैं घर में कुत्ते लाड प्यार से,
घर में आता मेहमान भी अब आवारा लगता है।
आदर सत्कार की जगह ले ली कुत्तों ने आजकल,
अपनों पर भौंकता कुत्ता भी प्यारा लगता है।
किसको दुख दर्द सुनाए बुजुर्ग
सुदर्शन अपना ही कुटुम्ब आज हत्यारा लगता है।
