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डॉ. प्रदीप कुमार

Inspirational

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डॉ. प्रदीप कुमार

Inspirational

घर की ओर प्रस्थान करोडॉ. प्रदीप कुमार

घर की ओर प्रस्थान करोडॉ. प्रदीप कुमार

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बचपन बीता, जवानी आई, 

साथ अपने सौ चिंताएं लाई, 

घर वालों ने कहा जब, करो कमाई, 

तब हमने दिल्ली की टिकट कटाई। 

सुबह हम दिल्ली पहुंचे भाई, 

पहुंचते ही बारिश की आफत आई। 

घंटों तिरपाल के नीचे खड़े रहे, 

गरम चाय खोजते रहे, 

बारिश थमी तो रिक्शा किए, 

थोड़ी देर में कार्यालय पहुंचे। 

कार्यभार ग्रहण किया, 

आसपास का थोड़ा जायज़ा लिया। 

अब सर छुपाने की चिंता हुई, 

अपनी परेशानी लोगों से कही, 

एक सज्जन को दया आई, 

वो बोले, मेरे साथ चलो तुम भाई। 

नौकरी मिली, घर भी मिल गया, 

मानों ये जनम अब सफल हुआ। 

जैसे-जैसे कुछ दिन बीतने लगे, 

हम घुट-घुट कर जीने लगे, 

घर की चिंता फिर सताने लगी,

मां भी वापस बुलाने लगी। 

अब हर हफ़्ते घर जाने की तलब जगी, 

तब आर्थिक परेशानी बढ़ी, 

नौकरी छोड़कर घर को चलें? 

या ऐसे जिंदा रहकर मरते रहें? 

फिर एक रोज़ कसम ये खाई, 

अब चाहे जो हो जाए भाई, 

मेहनत करेंगे, और पढ़ेंगे, 

पर अपने घर में नौकरी लेकर रहेंगे। 

न टिकट कटाने की चिंता रहेगी, 

न सर खपाने की चिंता रहेगी, 

छुट्टी बचेगी, पैसा बचेगा, 

हमारे साथ ही मां-बाप का मन लगेगा,

हमको मनचाही खुशी मिलेगी,

उन लोगों की थोड़ी उमर बढ़ेगी।


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