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Abhilasha Chauhan

Abstract

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Abhilasha Chauhan

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घिरे थे जो बादल

घिरे थे जो बादल

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घिरे थे जो बादल,

वो छंटने लगे हैं।

तने थे वे ऐसे,

कि निकले न सूरज।


सूरज के तेवर से,

डरने लगे हैं।

छाए थे बादल,

बीते कितने वर्षों से।


घुटने लगा था,

घाटी का दम भी।

उजड़ती गई थी,

रौनकें वहां की।


बनके आतंक,

बरसते थे बादल।

लहू का रंग से,

रंगे थे ये बादल।


बरसते थे ओले,

बम और गोलियों के।

कुटिल चालों से काले,

रहे थे ये बादल।


कीचड़ ही कीचड़,

हुई हर गली थी।

सुकून की कली कब,

वहां खिली थी।


चमका जो सूरज,

डरे थे ये बादल।

घाटी से अब तो,

छंटेंगे ये बादल।


खुशियों के फिर से,

बरसेंगे बादल।


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