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बिमल तिवारी "आत्मबोध"

Inspirational

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बिमल तिवारी "आत्मबोध"

Inspirational

ग़ज़ल

ग़ज़ल

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अब नहीं है गाँव में रोज़ी-रोज़गार, बाबू जी,
शहर बुलाता रोज़ है बार-बार, बाबू जी।

 सूनी पड़ी हैं मेड़ों पर हल की सारी चाल, खेतों से ज़्यादा बिकता है बाज़ार, बाबू जी।
 छोड़ के पीपल, पोखरा, छूटा अपना गाँव,
आँखों में बसता रहता है घर-द्वार, बाबू जी।

 रोटी की ख़ातिर निकले हैं कितने लाल यहाँ,
 कंधों पर सपनों का है भारी भार, बाबू जी।

 लौटेंगे जिस दिन फिर से हँसता होगा गाँव,
जब होगा हर हाथ को रोज़गार, बाबू जी। ©आत्मबोध


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