STORYMIRROR

Megha Rathi

Abstract

3  

Megha Rathi

Abstract

ग़ज़ल

ग़ज़ल

1 min
262


दुनिया से दर्द अपना छिपाने में रह गया

मैं नज़्म था तराने सजाने में रह गया


दम तोड़ गई छांह घने बरगदों की फिर

मैं खुद को आंधियों से बचाने में रह गया


वो साथ मेरा छोड़ कभी जाएगा नहीं

ताउम्र इस गुमाँ को निभाने में रह गया


देखा नहीं उसने मेरी आँखों में झांक के

वो नासमझ मुझे क्यों रुलाने में रह गया


वो आखिरी सलाम किसी ने देखा नहीं

ज़ालिम जहाँ ये जिस्म जलाने में रह गया


गैरों का फ़र्ज़ अपने निभाते रहे सदा

मै अश्क सबसे छुप के सुखाने में रह गया



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract