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संजय असवाल "नूतन"

Abstract Tragedy Others

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संजय असवाल "नूतन"

Abstract Tragedy Others

गौरैया की पुकार..!

गौरैया की पुकार..!

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छोटी सी मैं नन्ही चिड़िया, 

चहकू रोज़ मुहाने,

आंगन, बाग, खेत, खलियान

सब मेरे हैं ठिकाने।


पहले थी मैं घर की रौनक, 

इधर उधर फुदकती रहती,

अब तो मेरा नाम सुनकर, 

दुनिया आहें भरती रहती।


छोटी-छोटी खुशियों वाली, 

थी मैं चिड़िया प्यारी प्यारी,

इंसानों का लालच मुझ पर

अब पड़ रहा है भारी।


बंद हुए वो खुले आंगन, 

घर हुए कंक्रीट के,

कटते पेड़, बढ़ता जहर, 

हाल बुरे हैं रीत के।


मैं उड़ना चाहूं आसमान में, 

लेकिन अब जगह सही ना पाऊं,

मिट्टी की खुशबू थी जिनमें, 

वो घोंसले कहां से लाऊं?


उम्मीद रखूं मैं तुमसे हरदम

आस सदा लगाऊं,

रोज तुम्हारे आंगन में आकर

मैं तो तुम्हें बुलाऊं।


कुछ दाने, पानी, एक कोना, 

इतना ही तो मैं चाहूं,

बस तुम्हारे घर में, मैं...!

फिर से एक कोना चाहूं।


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