STORYMIRROR

Pallavi Garg

Abstract

3  

Pallavi Garg

Abstract

एक उदासी

एक उदासी

1 min
221

अब लगता है, मानो जैसे

जिन्दगी बन गयी हो पत्थर

और वक्त बन गया हो

वो दरिया जो बह रहा हो

इन पत्थरों पे से।


अब लगता है मानो जैसे

अगर कोई तूफान इस

दरिया में आ भी जाएगा

तो भी इन पत्थरों को नहीं

हिला पाएगा।


अगर ले गया कोई

शिल्पकार इन्हें उठाकर तो

कोई मूर्ति भी नहीं गढ़ पाएगा।


अब तो दरिया में पड़ा ये पत्थर

इतिहास ही कोई नया रच पाएगा।।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract