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संजय असवाल "नूतन"

Tragedy

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संजय असवाल "नूतन"

Tragedy

एक पत्र तुम्हारे नाम

एक पत्र तुम्हारे नाम

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एक पत्र लिखा है, 

तुम्हारे नाम,

वक्त मिले तो पढ़ लेना, 

इन तल्खियों के बीच, 

थोड़ा बहुत जो रिक्त रह गया था,

तुम्हारे हमारे दर्मियां,

वो भी समय के साथ पाटने लगा हूं मैं अब,

तुम्हारी बेरुखी,

बेशर्म नज़रों की हरारतें,

तुम्हारी बातों की वो चुभन,

जो सरे महफ़िल जलालत भर देती है,

दिल पर लगे तुम्हारे दिए जख्मों को कुरेद देती है,

वो अट्टहास तुम्हारा मेरी मर्म यादों पर,

मेरे मरते हुए रिश्तों को घावों से भर देती है,

तुम्हारी हर वो बात,

जो मुझसे तुम्हारी नफरतों को बयां करती है,

तुम्हारी आंखों में वो दंभ,

जो मुझे तुम्हारे आसमानी रुतबे और

मेरी जमीनी हकीकत से 

रूबरू कराती है, 

तुम्हारा अभिमान और मेरा प्रेम 

अब साथ साथ नहीं रह सकते,  

प्रेम एक शाश्वत सत्य है, 

वह अपने संपूर्ण पहलूओं का सम्मान करता है,

प्रेम और सम्मान दोनों साथ साथ चलते है,

दोनों साथ होंगे या 

फिर दोनों नहीं होंगे।


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