एक दिन अचानक
एक दिन अचानक
एक दिन अचानक उस मोड़ पर वो चेहरा दिखा, जो ले आया कुछ धुंधली यादें अतीत की। याद आईं वो रातें जो बीत गईं, वक़्त एकदम थम सा गया, उन ख्यालों में कुछ रम सा गया। याद आईं मुझे उनसे की हुई वो बातें, कितनी हसीन थीं हमारी वो मुलाकातें। फिर एहसास हुआ कि ये अब ख़ामोशी के साए हैं, मैं जानता हूँ, अब वो अपने नहीं, हो चुके पराए हैं|. तब एक ऐसी शूल चुभी सीने में, कहाँ चूक हुई हमसे जीने में? पूछता रहा — तू ही बता मेरे ख़ुदा, किसका था कसूर जो हम ऐसे हुए जुदा? दिन-रात जिनकी चाहता था मैं ख़ैर, क्यों आज हूँ मैं उनके लिए एक ग़ैर? मांगता था दिल जिनके लिए मुरादें, क्यों बन गया हूँ मैं आज उनके लिए बस यादें? वो यादें जो शायद ही कभी उन्हें आती होंगी, वो यादें जो कभी खुशी तो कभी उन्हें रुलाती होंगी। दिल ने कहा — मैं फिर से उनको बुला लूँ, फिर से कुछ लम्हे उनके साथ बिता लूँ, अपने दिल के सारे अरमान उन्हें सुना दूँ, और उनकी सभी शिकायतों को गले से लगा लूँ। रुक गए कदम जो आगे बढ़ना चाहते थे, ख़ामोश रही ज़ुबान जो कुछ कहना चाहती थी। मन ने किया शांत रहने का इरादा, याद आया उनसे किया हुआ वादा। वक़्त था तब वो मेरी बर्बादी का, कार्ड दिया था उन्होंने जब अपनी शादी का। टूट गया दिल, बिखर गई उम्मीदें, छूट गया वो सहारा, कहा मैंने उनसे — अब न अपनी शक्ल दिखाऊँगा दोबारा। फिर छोड़ दिया मैंने उनको उनके ही हाल में, मैंने देखा अब वो खुश हैं अपने ससुराल में। है अब उनकी एक नई दुनिया, एक नया फ़साना, मैं भी आगे बढ़ गया, छोड़ गुज़रा हुआ ज़माना। हुई आँख नम, सोचकर वो बिछड़ी हुई बातें, हमने भी काटी थीं जागकर कई रातें। निभाई हर बात जिसका इज़हार किया था, हाँ दोस्तों, मैंने भी कभी किसी से प्यार किया था।
