एक चाय, एक तुम और वो बारिश....
एक चाय, एक तुम और वो बारिश....
एक चाय ,एक तुम और वो बारिश....
सब कुछ कितना
अजिब सा है ना
सबकुछ तो आज भी है
उसी जगह पर,
पर अब वो पल न रहें,
जब हम एक दुसरे को
कॉल कर के पूछा करते थे
जब हम एक दूसरे का इंतजार किया करते थे
कुछ पलों के लिए और
एक साथ एक कप चाय के लिए,
पर अब भी सब कुछ वहीं पर है
पर कुछ न रहा ,
लेकिन कहीं रूक रूक याद आता है,
वहीं..
एक चाय ,एक तुम और वो बारिश....
अब भी बरसात बरसती तो है,
पर खुशबू तुम्हारी अब इसमें महकती नहीं है,
घंटों चाय उबालती तो है,
लेकिन
तुम्हारी मुस्कराहट का स्वाद
अब इसमें आता नहीं है,
अब कितना रास्तों पर भटक लूं
तो भी,
वो खोये हुए भूले बिसरे पल मिलते नहीं है..
बस और बस अब बाकी है,
एक चाय ,एक तुम और वो बारिश....
@ks
