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राजेश "बनारसी बाबू"

Romance

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राजेश "बनारसी बाबू"

Romance

एक बेवफा से मुलाकात

एक बेवफा से मुलाकात

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.चलते दफा एक बेवफा से मुलाकात हो गई

जिससे डरते थे वही बात हो गई

किस्मत का तकाजा अब दिखने लगा है

खुदा कहने वाला शख्स अब हमे वेवफा कहने लगा है

कल तक जो मुझसे मोहब्बत करती थी

कल तक जो मेरे लिए सजती संवरती थी

वो अब किसी और के बाहों आजकल दिखने लगी है 

कल तक जो शाम ढलती थी मेरे बांहों में वो शाम कही और ढलने लगी है

कल तक जो मुझे खुदा कहती थी आज वो मुझे खुले आम बेवफा नाम कहने लगी है

कभी कभी बातो ही बातो में जिक्र होती है

उसकी दिया डायरी अब भी कभी खुलती तो कभी बंद होती है

अब चंद रोज से खिड़की अब खुलने लगी है

इशारों इशारों में अब गैरो से बात होने लगी है

कभी जो शेरो शायरी गजल मेरे लिए कहा करती थी

अब वो ना जाने क्यू मुझसे मुंह फेर लिया करती है

कभी जो वो दूर फलक तक मुझसे बाते किया करती थी

कभी जो मेरे सीने पे सर रख दिल की धड़कन सुना करती थी

क्या अब भी तुम मुझसे मोहब्बत करते हो

क्या अब भी तुम तन्हाई में आहे भरते हो

सुन कर बस आंखो में अश्क भर जाता है

किसी और के साथ हो वो सहा ना जाता है

जो तेरे ना हुए तो किसी के ना रहेंगे

अब लबों पे बस यही गाना आ जाता है

क्या अब भी ये गीत गाते हो

क्या अब भी हमे याद करते हो

मेरी प्यार में कितनी सिद्दत्त है कैसे मैं बताऊं

दिल चीर के अपना महफिल में कैसे मैं दिखाऊं

तुमसे बस एक ही शिकायत है

तन्हाई में अब बस रोने की आदत है

मुझे यादों में क्यूं सताती हो

तन्हाई वाली रातों में क्यूं रुलाती हो

अब मुक्कदर से एक ही शिकायत है

मोहब्बत की गलियों में क्यूं नही रियायत है

मेरी मोहब्बत का साथ हमे दुबारा ना मिला

बिछड़ा हुआ मेरा प्यार क्यूं कभी हमारा ना हुआ

अब राहों में चुपके से यूं ही चले जाते हो

ना जाने क्यू मुझसे मुंह फेर कर चले जाते हो

सदियों तक याद रहेगी तेरी बेवफाई

यांदो के लाशों को बोल कहा मैं दफनाऊं

बोल ना हरजाई तुझसे दूर कहा जाऊं मैं 

हर बार वार किया हर जख्म हर चोट पे वार किया

कभी कभी सोचता हूंँ कितना अश्क बहाऊं

अपने अश्क के सैलाब को महफिल में कैसे मैं छुपाऊं

तेरी बेवफाई पे अपने आँशू बहा रहा हूंँ

भीड़ भरी महफिल में रोकर भी मुस्करा‌ रहा हूंँ।



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