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Ram Binod Kumar

Abstract

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Ram Binod Kumar

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एक अनजान आदमी

एक अनजान आदमी

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एक अनजान आदमी !

केवल आदमी ही क्यों ? औरत - बच्चें !

लड़के लड़कियां सभी हैं, अनजान बेचारे।।

एक अनजान और नादान न सोचें- विचारे

अपनी बाल संवारे ,उसकी रूप निहारे।

एक अनजान आदमी ....!

जिए जा रहे हैं, और बढ़ें जा रहे हैं।

पर न रास्ते की खबर, न मंजिल पता है।।

किसे कहां-कैसे जाना यह भी नहीं पता है।

बस सभी भेड़ चाल में बढ़ते चलें जा रहे हैं।

एक अनजान आदमी .....!

क्या -क्या खाएं ? क्या नहीं है खाना ?

बस स्वाद सभी ले लेकर , खाए जा रहे हैं।।

खाए जा रहे हैं ,पर न तो चबाएं जा रहे हैं।

पेट- स्वाद के लिए सभी खाए जारहे हैं।।

क्या पोषण मिलेगा ? क्या होगा नुकसान ?

कौन सोचता है.. ? एक अनजान आदमी।।

क्या पहनें ,और क्या नहीं है, पहनना ?

कैसे रहे ? और अब कैसे नहीं है रहना ?

क्या कहें ? और अब क्या है ,नहीं कहना ?

कितना सहें ?और अब क्यों नहीं है सहना?

कहां रहे अब ? क्यों नहीं है वहां रहना ?

यह कुछ भी नहीं है जानता ।

एक अनजान आदमी !

विषय वस्तु पता नहीं, बस पढ़े जा रहे हैं ।

मुद्दे पता नहीं बस ,सरपट बोले जा रहे हैं।।

उद्देश्य का पता नहीं, बस लिखे जा रहे हैं।

तथ्य कुछ पता नहीं बस हंसे जा रहे हैं।।

एक अनजान आदमी !

दृश्य कुछ पता नहीं, बस देखे जा रहे हैं।

मित्र पता नहीं बस, गले मिले जा रहे हैं।।

दुश्मन का भी पता नहीं बस डरे जा रहे हैं।

कमजोरियां नहीं बस ,सिकुड़े जा रहे हैं।।

आधार भी पता नहीं बस, अकड़े जा रहे हैं।

एक अनजान आदमी !

मिलने का पता नहीं बस, दिए जा रहे हैं।

मिले ना मिले बस ! हम तो मांगे जा रहे हैं।।

क्या मिलेगा पता नहीं, बस जागें जा रहे हैं।

कौन पीछे पड़ा पता नहीं, भागे जा रहे हैं।।

निशाना मिले ना मिले, बस दागें जा रहे हैं।

कभी पीछे जा रहे हैं कभी आगे जा रहे हैं।।

अब सब अनजान आदमी !

जो पढ़नी नहीं वह ,अब तो पढ़े जा रहे हैं।

न जाने सभी किस मार्ग पर बड़े जा रहे हैं ?

जिसे डटना नहीं, उसके आगे डटे जारहे हैं।

जिस से सटना नहीं उसी से सटे जा रहे हैं।।

जिस से हटना नहीं उसी से हटे जा रहे हैं।

एक अनजान आदमी !

जिसको खोना नहीं, उसे खोए जा रहे हैं।

जिसका कोई मोल नहीं उसे रोए जारहे हैं।।

जिसमें मैल भरा उसे कभी धोते भी नहीं।

जो साफ है बस, उसी को धोए जा रहे हैं।

कोई रोल नहीं उसे हीरो समझें जा रहे हैं।।

खलनायक के कदमों में अब गिरे जा रहे हैं।

एक अनजान आदमी!

जिसे देखना नहीं उसे ही देखे जा रहे हैं।

बस देखा- देखी काम किए ही जा रहे हैं।।

जो पीना नहीं उसे अब सब पिए जा रहे हैं।

दूध-दही कौन पूछता,कोला पिए जा रहे हैं।

कुछ नहीं जानता ,बस चमक पहचानता।

देवों कोभी ना जानता, खुद ईश्वर मानता।।

बस जय ......नमो ......ही है, यह जानता।

एक अनजान आदमी !



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