STORYMIRROR

ललित सक्सैना

Abstract Classics

4  

ललित सक्सैना

Abstract Classics

एहसास बिखरते रिश्तों का

एहसास बिखरते रिश्तों का

1 min
279

सब हदों से गुज़र गए है हम........

तुमने देखा और संवर गए हैं हम

आंधियां वक्त की चली कुछ ऐसी

जर्रा जर्रा बिखर गए हैं हम


अब तो मौजूद ही नही खुद में

यूं किसी में उतर गए हैं हम

मौत का तो पता नही कुछ भी

जिंदगी तुझे से डर गए हैं हम


अक्स मोहब्बत के है जिन दीवारों में

बाद अर्से के घर गए हैं हम

ला न पाए जो सामने सच को

आज लगता है मर गए हैं हम


था असरदार गम का पैमाना

खुद से बेखबर हो गए हैं हम।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract