दुनिया
दुनिया
ये जुल्मों सितम और पापों की दुनिया
कहां हैं सभी के ख्वाबों की दुनिया
सवालों की महफिल हजारों मिलेंगी
सिमट सी गई हैं जवाबों की दुनिया
सभी के दुख जब अपने थे लगते
मिलते थे तो कैसे सजते थे मेले
लिये हाथ में देखो खंजर हैं अब सब
भीड़ में भी देखो तन्हा है दुनिया
इश्क भी तो जिस्मों में फंस सा गया है
कहां अब बची हैं वह रूहानी से दुनिया
हर फितरत अब ऐसी गिरा दूं किसी को
चले साथ ऐसी कहां है अब दुनिया
घरों में ही रहते इंसानों के दुश्मन
दिखतें हैं हम जैसे हमारे ही दुश्मन
कभी दोस्ती तो कभी पास वाले
कितने ही रंग में बदलती हैं दुनिया
करोगे तो कैसे भरोसा बता दो
रिश्तों को अब सूली चढ़ा दो
दिखाओगे किसको नासूर जख्म
कई वार लेकर टहलती है दुनिया
ये जुल्मों सितम और पापों की दुनिया
कहां हैं सभी के ख्वाबों की दुनियाा।
